Sunday, August 23, 2026

 

क्या पत्रकारिता में विचारधारा ’ 

महत्वपूर्ण है

पत्रकारिता में निष्पक्षता के भ्रम की चीरफाड़ करता विचारोत्तेजक व्याख्यान


वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार भारत भूषण (बेंजवाल) 'कैच न्यूज' के संपादक, 'मेल टुडे' के संस्थापक संपादक, 'हिंदुस्तान टाइम्स' के कार्यकारी संपादक (एग्जीक्यूटिव एडिटर) और दिल्ली में 'द टेलीग्राफ' के संपादक रहे हैं। वह 'एक्सप्रेस-न्यूज सर्विस' के संपादक, 'द इंडियन एक्सप्रेस' के वाशिंगटन संवाददाता (कॉरस्पॉन्डेंट) और 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' में सहायक संपादक (असिस्टेंट एडिटर) भी रहे हैं। वह अभी एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी और वैश्विक समाचार-एजेंसी मॉडल पर आधारित पत्रकारिता मंच '360 इनफो' के एसोसिएट एडिटर (सह-संपादक) और साउथ एशिया एडिटर (दक्षिण एशिया संपादक) हैं। प्रस्तुत है चतुर्थ पं. भैरव दत्त धूलिया पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में उनका व्याख्यान।

भारत में पत्रकारिता का जन्म ही विचारधारा के साथ हुआ था। जहाँ अंग्रेज़ी भाषा के समाचार पत्र औपनिवेशिक हितों और अपने यूरोपीय पाठकों की सेवा करते थे, वहीं भाषायी प्रेस ने भारतीयों की राजनीतिक चेतना को जगाने का काम किया। तब पत्रकारिता में तटस्थता का कोई ढोंग नहीं था। शुरुआती राष्ट्रवादी प्रेस किसी तटस्थ जनता को केवल सूचना देने की कोशिश नहीं रही थी बल्कि वे एक राष्ट्रवादी जनता का निर्माण के लिए प्रयासरत थे, एक अखिल भारतीय, उपनिवेशवाद-विरोधी चेतना को आकार दे रहे थे। यह पत्रकारिता राष्ट्र-निर्माण का एक अभ्यास थी और खुलकर वैचारिक थी।

उपनिवेशवाद-विरोधी समाचार पत्र न केवल दुनिया की रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रहे थे बल्कि उसे बदलने की कोशिश कर रहे थे। बाल गंगाधर तिलक के 'केसरी' ने अंग्रेजों के खिलाफ हिंसक विरोध को बढ़ावा दिया और हिंदू पुनरुत्थानवाद को आगे बढ़ाया; गांधी के 'यंग इंडिया' और 'हरिजन' ने सविनय अवज्ञा को बढ़ावा दिया और पत्रकारिता को नैतिक सुधार के साधन के रूप में देखा; मौलाना आज़ाद के 'अल-हिलाल' ने पैन-इस्लामिज्म (इस्लामवाद) में रची-बसी उपनिवेशवाद-विरोधी भावना को बढ़ावा दिया। हर अखबार एक अलग और प्रतिस्पर्धी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता था। किसी ने भी तटस्थ होने का दावा नहीं किया। वे सभी वैचारिक थे और उन्हें इस पर गर्व था।

पंडित भैरव दत्त धूलिया का 'कर्मभूमि' उसी परंपरा का हिस्सा था। भक्तदर्शन जी के साथ मिलकर, धूलिया जी ने गढ़वाल के अपने पाठकों के बीच एक राष्ट्रवादी जनता को आकार देने के लिए लगातार लिखा, वे कंपनी के निदेशक के उस दबाव के खिलाफ भी डटे रहे जिसने उन्हें ब्रिटिश अधिकारी को नाराज करने वाले अनाम संपादकीय छापने पर इस्तीफा देने की धमकी दी थी।

आज के भारत में पत्रकारिता और विचारधारा पर बात से पहले, एक बुनियादी सवाल है। जब हम पत्रकारिता में विचारधारा की बात करते हैं, तो हमारा क्या मतलब होता है?

मार्क्स ने विचारधारा को "प्रभुत्वशाली विचारधारा" के रूप में परिभाषित किया यानी शासक वर्ग के विचार जो व्यापक रूप से समाज की सामान्य समझ के रूप में स्वीकार कर लिए जाते हैं, जिससे उत्पीड़ित समूह उन मूल्यों पर विश्वास करने लगते हैं जो वास्तव में उनके उत्पीड़कों के हितों का समर्थन करते हैं। उन्होंने इसे "मिथ्या चेतना" कहा।

एंतोनियो ग्राम्शी ने इसका विस्तार किया कि कैसे प्रभुत्वशाली विचारों को स्कूलों, मीडिया और चर्च के माध्यम से तब तक फैलाया जाता है जब तक कि वे तटस्थ न लगने लगें। इसे  उन्होंने "सांस्कृतिक वर्चस्व"  कहा।

अल्थूजर ने स्पष्ट किया कि क्यों सामाजिक संस्थाओं परिवार, शिक्षा, मीडिया के माध्यम से विचारधारा को व्यवस्थित रूप से पुनरुत्पादित किया जाता है, जिन्हें उन्होंने "वैचारिक राज्य उपकरण" कहा। कार्ल मैनहेम विचारधारा को पूरी तरह से नकारात्मक रूप में देखने से पीछे हटे और उन्होंने उन विचारधाराओं के बीच अंतर किया जो यथास्थिति को बनाए रखती हैं और जो दुनिया को बदलना चाहती हैं।

देखिए, ये सभी परिभाषाएँ पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए कैसे प्रासंगिक हो जाती हैं।

विचारधारा पत्रकारिता में कई स्तरों पर काम करती है। संरचनात्मक, संस्थागत, व्यावसायिक, संज्ञानात्मक और भाषायी, जो सभी आपस में जुड़े हुए हैं। समाचार संगठन का स्वामित्व यह तय करता है कि क्या प्रकाशित होने योग्य है और क्या नहीं। मालिक ऐसे संपादकों को रखते हैं जो उनके विश्वदृष्टिकोण को साझा करते हैं; संपादक ऐसे पत्रकारों को रखते हैं जो उस सांचे में फिट बैठते हैं। समय के साथ, संगठन एक ऐसी संस्कृति विकसित कर लेता है जो उसमें काम करने वाले हर व्यक्ति को स्वाभाविक लगती है, क्योंकि असहमत होने वालों को बाहर कर दिया जाता है। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के बारे में यह कहावत है कि उसने बहादुर शाह जफर को छोड़कर दिल्ली के सभी शासनों का समर्थन किया। वहां काम कर चुके हम सभी को यह सच्चाई पता है।

फंडिंग भी पत्रकारिता को वैचारिक रूप से आकार देती है। यदि किसी समाचार पत्र के विज्ञापन राजस्व का 45 से 50 प्रतिशत हिस्सा सरकारी विज्ञापनों से आता है, तो उसके पत्रकार अनजाने में उन खबरों से बचते हैं जिनसे वह राजस्व छिन सकता है। किसी भी संपादक को यह कहते हुए मेमो जारी करने की जरूरत नहीं होती कि "सरकार के विरुद्ध पड़ताल मत करो।" पत्रकार संगठनात्मक संस्कृति को देखकर और उसे अपनाकर सीखते हैं। 'बीट' (कार्यक्षेत्र) की संरचना इसे और मजबूत करती है: जिस क्षण आपके पास एक "बिजनेस बीट" होती है और कोई "लेबर बीट" (मजदूर बीट) नहीं होती, यह स्पष्ट हो जाता है कि अर्थव्यवस्था को पूंजी के दृष्टिकोण से समझा जाना है।

विचारधारा न्यूज़रूम संस्कृति के माध्यम से भी काम करती है। संपादकीय प्रक्रिया के हर चरण में 'गेटकीपिंग' (खबरों की छंटनी) होती है।  संवाददाताओं से लेकर उप-संपादकों और संपादक तक लगातार यह निर्णय लिया जाता है कि कौन सी चीज़ खबर बनने के योग्य है। हर गेटकीपर का मानना होता है कि वह व्यावसायिक रूप से तटस्थ है, लेकिन वे वैचारिक धारणाओं से पूरी तरह सराबोर होते हैं। "हमें और अधिक संतुलन की आवश्यकता है" का अर्थ अक्सर यह होता है कि "हमें इस असहज करने वाले निष्कर्ष का मुकाबला करने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से एक आवाज़ की आवश्यकता है।" स्रोतों का पदानुक्रम इसे और जटिल बना देता है: सत्ता के स्रोतों, कॉर्पोरेट हस्तियों और विशिष्ट संस्थानों के विशेषज्ञों को विस्थापन का दावा करने वाले आदिवासियों, शोषण का दावा करने वाले श्रमिकों या भेदभाव का दावा करने वाले अल्पसंख्यकों की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक विश्वसनीय माना जाता है।

व्यावसायिक मानदंड भी विचारधारा के रूप में कार्य करते हैं। निष्पक्षता को अक्सर तटस्थ मानकों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है लेकिन वास्तव में ये वैचारिक फिल्टर के रूप में कार्य करते हैं।

जब दोनों पक्ष समान न हों, तो "संतुलन" व्यवस्थित रूप से वास्तविकता को विकृत कर देता है। जब मैंने 1997 में 'हिंदुस्तान टाइम्स' के लिए थाईलैंड में नागा विद्रोही नेता थुइन्गालेंग मुइवा का साक्षात्कार लिया, तो मुझे भारत सरकार के मुख्य नागा वार्ताकार का फोन आया, जिन्होंने पूछा कि मैंने सरकार का दृष्टिकोण क्यों शामिल नहीं किया। मैंने उनसे कहा: "50 से अधिक वर्षों से समाचार पत्रों में केवल भारत सरकार का दृष्टिकोण ही दिखाई दिया है। क्या नागाओं को तुरंत उनका खंडन किए बिना अपना दृष्टिकोण रखने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?" जलवायु वैज्ञानिकों और जलवायु परिवर्तन को नकारने वालों को समान स्थान देने से संतुलन पैदा नहीं होता  बल्कि यह यह संकेत देता है कि एक वैज्ञानिक रूप से सुलझा हुआ प्रश्न अब भी खुला है। कभी-कभी आपको दो विरोधाभासी स्रोतों को उद्धृत करने के बजाय खुद खिड़की से बाहर देखने की ज़रूरत होती है।

कोई घटना बयान आदि समाचार है या नहीं यह न्यूजवर्दीनेस भी उतनी ही वैचारिक है। संभ्रांत वर्ग के कार्यों को आम लोगों के कार्यों की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक समाचार-योग्य माना जाता है। गरीबी की धीमी हिंसा, भूख, बीमारी, विस्थापन शायद ही कभी खबर बनती है क्योंकि इसमें नाटक और नयापन नहीं होता। जब मैं 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में था, तो मालिक कहा करते थे: "यमुना पुश्ता की झुग्गियों में लगी आग में किसी की दिलचस्पी नहीं है। वे हमारे पाठक नहीं हैं।" जब मैंने 'मेल टुडे' शुरू किया, तो मुझे पाठक की कल्पना एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करने के लिए कहा गया जो तीस के दशक के मध्य में है, जिसकी जीवनसाथी कामकाजी है, जिसके दो बच्चे हैं, एक कुत्ता है, और घर तथा कार पर ईएमआई है। समाचार-योग्यता उस कल्पित पाठक के मूल्यों और इसलिए उसकी विचारधारा  को संहिताबद्ध करती है।

विचारधारा संज्ञानात्मक  स्तर पर भी काम करती है। 'फ्रेमिंग' (खबर को एक खास नजरिए से पेश करना) वह जगह है जहाँ विचारधारा पत्रकारों के ध्यान में आए बिना ही खबर में प्रवेश कर जाती है। उन्हीं तथ्यों को आर्थिक विकास, असमानता, राष्ट्रीय सुरक्षा या मानवाधिकारों की कहानी के रूप में पेश किया जा सकता है। विचार करें कि मीडिया 'ग्रेट निकोबार द्वीप' पर प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट पोर्ट को कैसे फ्रेम करता है, सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप सरकार का दृष्टिकोण अपनाते हैं, कॉर्पोरेट का दृष्टिकोण, पर्यावरण का दृष्टिकोण, या अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे लगभग 200 शोम्पेन आदिवासियों का दृष्टिकोण अपनाते हैं।

पुष्टि पूर्वाग्रह तब काम करता है जब पत्रकार एक मजबूत धारणा के साथ जांच शुरू करते हैं: इसका समर्थन करने वाले साक्ष्य विश्वसनीय लगते हैं; विरोधाभासी साक्ष्य किसी एजेंडे से प्रेरित लगते हैं। सामान्यीकरण रोज़मर्रा की परिचितता के माध्यम से मौजूदा सत्ता संरचनाओं को अदृश्य बना देता है यही आंशिक कारण है कि अधिकांश पत्रकार तमिलनाडु में सी. जोसेफ विजय की टीवीके पार्टी के उदय की भविष्यवाणी नहीं कर सके। लोग वह नहीं देखते जिसे देखने के लिए उन्हें प्रशिक्षित नहीं किया गया है।

विचारधारा भाषा में भी काम करती है। लेबलिंग (नाम देना) विवरण में ही विचारधारा को समाहित कर देती है। "आतंकवादी" बनाम "उग्रवादी" बनाम "स्वतंत्रता सेनानी" वैधता और उद्देश्य के बारे में एक राजनीतिक निर्णय का प्रतिनिधित्व करता है। किसी को "शहरी नक्सल" या "देशद्रोही" कहना, गो-रक्षण से जुड़ी हिंसा को "मॉब-लिंचिंग" बनाम "सांप्रदायिक घटना" के रूप में वर्णित करना, आरक्षण को "योग्यता बनाम कोटा" के रूप में फ्रेम करना ये बेहद वैचारिक भाषाई विकल्प हैं। कर्मवाच्य सक्रिय कर्ता को गायब कर देता है: "पांच प्रदर्शनकारी मारे गए" हमें यह नहीं बताता कि उन्हें किसने मारा। "हिंसा भड़क उठी" संगठित कार्रवाई के बजाय स्वतःस्फूर्त स्वतः-प्रज्वलन का सुझाव देती है।

रूपक समाचार रिपोर्ट के तर्कों के भीतर ही समझ को आकार देते हैं। बांग्लादेश से आने वाले प्रवासियों को "लहर" या "बाढ़" के रूप में वर्णित करना आपदा की छवियों को सक्रिय करता है। कॉर्पोरेट ऋणों को बट्टे खाते में डालने को "प्रोत्साहन" कहना उन्हें सकारात्मक रूप में फ्रेम करता है, जबकि गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी को "मुफ्त की रेवड़ियां" कहना यह दर्शाता है कि वे इसके हकदार नहीं हैं। रूपक अपने भीतर इस बात की विचारधारा समेटे होते हैं कि राजनीतिक रूप से क्या सोचना संभव है।

ऐसे दौर भी आए हैं जब पत्रकारिता में विचारधारा घातक हो गई है। विभाजन के आस-पास के वर्षों ने दिखाया कि क्या होता है जब हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों का सांप्रदायिक प्रेस अपने-अपने समुदायों को भड़काने की भूमिका निभाता है ऐसी पत्रकारिता जिसने सक्रिय रूप से नरसंहार की परिस्थितियाँ तैयार कीं।

यदि नेहरूवादी युग ने यह धारणा बनाई कि भारत के नए-नवेले प्रेस में मजबूत उदारवादी विचार रचे-बसे थे, तो इंदिरा गांधी ने हमें उस विश्वास से मुक्त कर दिया। आपातकाल  ने सेंसरशिप, संपादकों की गिरफ्तारी और समाचार पत्रों को बंद होते देखा। मुख्यधारा के अधिकांश प्रेस ने बिना किसी विरोध के आत्मसमर्पण कर दिया, सरकारी प्रचार चलाया और असुविधाजनक सच्चाइयों को दफन कर दिया। आपातकाल ने यह उजागर कर दिया कि भारतीय प्रेस हमेशा से सत्ता-परस्त था। जब सत्ता उदार थी, तो प्रेस उदार था; जब वह अधिनायकवादी हो गई, तो प्रेस ने बड़े पैमाने पर उसी का अनुसरण किया।

उदारीकरण के बाद के दौर ने भारतीय पत्रकारिता को इस कदर बदल दिया कि उसे पहचानना मुश्किल हो गया। टीवी चैनलों की बाढ़, 24 घंटे की खबरों और अंततः डिजिटल मीडिया ने एक जटिल वैचारिक परिदृश्य तैयार किया। हमारे पास किराए के लिए विचारधारा थी: 1990 और 2000 के दशक में 'पेड न्यूज' (पैसे लेकर खबर छापना)  यह तिलक, गांधी या भैरव दत्त धूलिया की सैद्धांतिक पक्षधरता नहीं थी, बल्कि पत्रकारिता को उसके हाथों बेच दिया गया जो भुगतान कर सकता था। 2000 के दशक में हिंदी टीवी समाचारों के विस्फोट ने लोकलुभावन, राष्ट्रवादी और अक्सर सांप्रदायिक रंग से रंगी विचारधारा को लाखों भारतीय ड्राइंग रूम्स में पहुँचा दिया, जहाँ दर्शकों की संख्या (टीआरपी) बढ़ाने के लिए गो-रक्षण, लव जिहाद और पाकिस्तान-विरोधी भावनाएँ रोज़मर्रा की खुराक बन गईं। बाजार और विचारधारा ने एक-दूसरे को मजबूत किया।

हालाँकि, 2014 के बाद से जो उभरा है वह गुणात्मक रूप से बिल्कुल अलग है। पिछले युग में, स्वतंत्रता आंदोलन सहित, पत्रकारिता वैचारिक थी लेकिन वैचारिक युद्धक्षेत्र बहुलवादी था। तिलक और गोखले ने अपने अखबारों के जरिए एक-दूसरे से लड़ाई लड़ी; समाजवादी प्रेस ने कांग्रेस प्रेस से मुकाबला किया। आज कुछ अनोखा हुआ है चार कारकों के संयोजन ने एक ऐसे वैचारिक मीडिया तंत्र का निर्माण किया है जो भारतीय लोकतंत्र के मूल स्वरूप को ही नया आकार दे रहा है। मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण हो रहा है है वह सत्ताधारी दल के साथ संरेखित हो रहा है। '

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने इसे "मोदी की भाजपा और मीडिया पर हावी बड़े घरानों के बीच एक दुःरभिसंधि " के रूप में व्याख्यायित किया है। मुकेश अंबानी के पास 70 से अधिक मीडिया आउटलेट हैं जो कम से कम 80 करोड़ भारतीयों तक पहुँचते हैं। गौतम अडानी द्वारा एनडीटीवी, क्विंट ब्लूमबर्ग और इंडो-एशियन न्यूज सर्विस का अधिग्रहण मुख्यधारा के मीडिया में बहुलवाद के अंत का संकेत देता है। इसका वैचारिक प्रभाव मुख्य रूप से स्पष्ट संपादकीय आदेशों का नहीं, यह संरचनात्मक है। स्वामित्व, समय के साथ संपादकीय संस्कृति को आकार देता है; किसी को फोन करने की जरूरत नहीं पड़ती। यही पैटर्न क्षेत्रीय मीडिया में भी फैला हुआ है, जहाँ राजनीतिक संबंध अक्सर और अधिक नग्न रूप में दिखाई देते हैं।  ओडिशा में, पांडा परिवार की मीडिया हिस्सेदारी भाजपा के एक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष से जुड़ी हुई है; असम में, एक प्रमुख टीवी चैनल का स्वामित्व भाजपा के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास है।

अब सरकारी विज्ञापन का उपयोग वित्तीय हथियार के रूप में होने लगा है। यहाँ तक कि राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों के विज्ञापन राजस्व का लगभग 45 फीसद हिस्सा सरकार से आता है। अकेले केंद्र सरकार विज्ञापनों पर रोजाना लगभग 1.95 करोड़ रुपये खर्च करती थी। भाजपा एक राजनीतिक दल के रूप में अलग से देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता भी है। वैचारिक नियंत्रण का तंत्र सीधा है अनुकूल कवरेज को विज्ञापन अनुबंधों से पुरस्कृत किया जाता है; आलोचनात्मक कवरेज विज्ञापनों की वापसी को ट्रिगर करती है। यह विशेष रूप से दमनकारी है क्योंकि यह सेंसरशिप का कोई लिखित दस्तावेज़ या सबूत नहीं छोड़ता। मीडिया मालिक और पत्रकार खुद ही सेंसरशिप लागू कर लेते हैं क्योंकि वे स्वतंत्रता के परिणामों को जानते हैं।

आलोचनात्मक रुख रखने वाले पत्रकारों का कानूनी उत्पीड़न भी शुरु हो गया है। आतंकवाद-विरोधी कानूनों, राजद्रोह और आपराधिक मानहानि को मीडिया दमन के हथियारों के रूप में नया रूप दिया गया है। पत्रकारों को तबाह करने के लिए उन्हें दोषी ठहराने की आवश्यकता नहीं है। गिरफ्तारी, हिरासत और फिर से गिरफ्तारी की लगातार बनी रहने वाली धमकी ही उन्हें व्यावसायिक रूप से बर्बाद करने के लिए काफी है। 2014 के बाद से, सरकार ने कम से कम 15 पत्रकारों पर यूएपीए के तहत आरोप लगाए हैं और 36 अन्य को जेल भेजा है; यह कानून बिना किसी मुकदमे के 180 दिनों तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है। 2019 में भाजपा ने यूएपीए में संशोधन किया ताकि अधिकारियों को अदालत में कोई अपराध साबित होने से पहले ही किसी व्यक्ति को "आतंकवादी" घोषित करने की अनुमति मिल सके। अप्रैल के अंत से मई 2025 की शुरुआत तक, 'ऑपरेशन सिंदूर' के आसपास, देश भर में कम से कम 125 मीडियाकर्मियों और कंटेंट क्रिएटर्स को "देशद्रोही" या "पाकिस्तान-समर्थक" माने जाने के कारण हिरासत में लिया गया। अकेले असम में 94 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं। इस खौफनाक माहौल में, आत्म-सेंसिरशिप इस दमन का, सह-उत्पाद नहीं है बल्कि यह इसका मुख्य उत्पाद है।

हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा और अल्पसंख्यक-विरोधी बयानों को व्यक्त करने और फैलाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों का लाभ उठाया गया है, और इन प्लेटफॉर्मों के एल्गोरिदम ऐसी सामग्री को बढ़ावा देते हैं। भाजपा ने व्हाट्सएप के उपयोग को व्यवस्थित किया है, जिसका बंद ढांचा सार्वजनिक एल्गोरिदमिक जांच से बाहर काम करता है, जिससे विश्वसनीय सामाजिक नेटवर्क पारिवारिक समूह, धार्मिक संघ, पड़ोस के समूह के माध्यम से भड़काऊ सामग्री का प्रसार संभव होता है, जो दुष्प्रचार को एक झूठी विश्वसनीयता प्रदान करता है।

ये चार कारक एक-दूसरे को बल देते हैं। कॉर्पोरेट स्वामित्व वाला मीडिया घटनाओं को इस तरह से फ्रेम करता है जो हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के अनुकूल हो, जिससे काल्पनिक शिकायतें भी आम समझ जैसी लगने लगती हैं। राज्य के विज्ञापन ऐसी फ्रेमिंग को वित्तीय रूप से पुरस्कृत करते हैं। कानूनी उत्पीड़न वैकल्पिक विमर्श प्रदान करने वालों को खत्म कर देता है या डरा देता है। एल्गोरिदमिक प्रवर्धन सोशल मीडिया को सबसे चरम भावनात्मक सामग्री से भर देता है, जिससे अन्य विकल्प बाहर हो जाते हैं। भारत के पास पत्रकारिता की पश्चिमी तटस्थता की कल्पना का विलास कभी नहीं था। दांव हमेशा ऊंचे थे उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन, सांप्रदायिक सह-अस्तित्व, जातिगत न्याय, क्षेत्रीय पहचान और लोकतांत्रिक जवाबदेही ने हमेशा भारतीय पत्रकारिता को आकार दिया है। भारत में पत्रकारिता ने हमेशा किसी न किसी चीज़ के लिए लड़ाई लड़ी है। सवाल यह है कि: किसके लिए लड़ रहे हैं, किसके खिलाफ लड़ रहे हैं और क्या यह लड़ाई ईमानदारी से लड़ी जा रही है।

ऐसे में पत्रकारों को क्या करना चाहिए? पत्रकार विचारधारा से छुटकारा नहीं पा सकते। हालाँकि, वे इसे प्रबंधित कर सकते हैं। लक्ष्य यह होना चाहिए कि व्यक्तिगत विश्वास कभी भी किसी पत्रकार को ऐसे तथ्य की रिपोर्ट करने से न रोकें जो उनके विश्वदृष्टिकोण के विपरीत हो। चूंकि पारंपरिक निष्पक्षता का अस्तित्व नहीं है, इसलिए एकमात्र समाधान पारदर्शिता है। इसके लिए पहले  अपने पूर्वाग्रह को स्वीकार करें: कोई राय न होने का ढोंग करने के बजाय, अपने विश्लेषण के ढांचे को लेकर खुले रहें ताकि पाठकों को पता चले कि आप किस दृष्टिकोण से बात कर रहे हैं। दूसरा, अपने स्रोतों, दस्तावेजों और डेटा को साझा करें; डिजिटल प्लेटफॉर्म खबरों और वैचारिक लेखों में उनके संदर्भों को शामिल कर सकते हैं। इसका अर्थ तटस्थता के बजाय सटीकता को प्राथमिकता देना भी है। तथ्य 50 प्रतिशत गलत और 50 फीसद सही नहीं होते। "दोनों पक्षों" को दिखाने के झूठे संतुलन से बचें आप एक तथ्यात्मक सत्य और एक सिद्ध झूठ को समान वजन नहीं दे सकते। यदि एक स्रोत कहता है कि बारिश हो रही है और दूसरा कहता है कि मौसम सूखा है, तो खिड़की से बाहर देखें।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्रकारों को उस चीज़ का पालन करना चाहिए जिसे "व्यावसायिक विचारधारा" या लोकतांत्रिक कर्तव्य कहा जा सकता है: एक प्रहरी की भूमिका निभाना और राजनीतिक दल की परवाह किए बिना शक्तिशाली लोगों को जवाबदेह ठहराना; कॉर्पोरेट या सरकारी हितों पर जनसेवा को प्राथमिकता देना; वित्तीय या सामाजिक संबंधों से बचना जो हितों का टकराव पैदा करते हैं; समाचार को विश्लेषण से अलग करना और उसी के अनुसार उन्हें चिह्नित करना; और समाचार रिपोर्टों में तटस्थ, वर्णनात्मक भाषा का उपयोग करना जबकि मजबूत बयानबाजी को वैचारिक लेखों के लिए सुरक्षित रखना।

उत्तराखंड के पत्रकारों के लिए कुछ विशिष्ट प्रश्न हैं। क्या आप स्थानीय मुद्दों को फ्रेम करते समय 'देवभूमि बनाम बाहरी' के आख्यान पर सवाल उठाते हैं? जब मीडिया ने पुरोला मामले को "लव जिहाद" का लेबल दिया, तो कौन से वैचारिक मुद्दे शामिल थे, भले ही अपहरण का मामला बाद में अदालत में खारिज हो गया? क्या आपने यूसीसी (को समानता की दिशा में एक कदम के रूप में रिपोर्ट किया या राजनीतिक ध्रुवीकरण के एक उपकरण के रूप में? क्या आपने हल्द्वानी में हुए ध्वस्तीकरण को अवैध अतिक्रमणों की आवश्यक "सफाई" के रूप में रिपोर्ट किया या अल्पसंख्यक आजीविका पर एक असंगत हमले के रूप में? क्या इस तथ्य को पर्याप्त रूप से रिपोर्ट किया गया था कि सरकार ने चार धाम सड़क परियोजना को विशेष रूप से अनिवार्य पर्यावरणीय प्रभाव आकलन से बचने के लिए 53 हिस्सों में तोड़ दिया था? इन घटनाओं को जिस भी तरीके से रिपोर्ट किया गया हो, उनके उत्तर आपको बताएंगे कि इसमें कौन सा वैचारिक दृष्टिकोण शामिल था।

इस तरह पत्रकारिता में विचारधारा का समाधान विचारधारा को खत्म करना नहीं है, क्योंकि ऐसा किया ही नहीं जा सकता। इसका समाधान यह जानना है कि सभी पत्रकारों की एक विचारधारा होती है और उसके बारे में पारदर्शी होना। यही पत्रकारिता को दुष्प्रचार से अलग करता है, और यही आत्म-जागरूकता आज सबसे अधिक दबाव में है।

(प्रस्तुतिः अरविंद शेखर) 

उत्तराखंड की प्रमुख मासिक पत्रिका 'युगवाणी' से साभार

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