(आज दुनिया में शायद ही कोई संवेदनशील इंसान होगा जिसे फिलिस्तीन के हालात ने विचलित न किया हो। लंबे समय से जारी संघर्ष, सैन्य कार्रवाइयों और नाकेबंदी के कारण वहां के नागरिकों का जीवन अस्त व्यस्त हो चुका है यह सब खबरों में आ रहा है लेकिन फिलिस्तीनियों के मन की उखाड़ पछाड़ को तो साहित्य ही दर्जकर रहा है। यादवेन्द्र लगातर इस साहित्य को अनुवाद के जरिये हिन्दी के पाठकों के सामने लाते रहे हैं। अब यह किताब के रुप में सामने आया है। यहाँ प्रस्तुत है , इस किताब की भूमिका)
अब भी वह फ़िलिस्तीन है
कोई सुबूत न होगा
तुम्हारे होने का
न आया फ़न
जो क़लम खून में डुबोने का
-- रईसुदीन रईस
हमारी पीढ़ी फ़िलिस्तीन, दक्षिण अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और संयुक्त राज्य अमेरिका की अश्वेत आबादी इत्यादि के मुक्ति संघर्ष की खुली और चेतन सांस्कृतिक हवा में बड़ी हुई है और नेल्सन मंडेला, चे ग्वेरा, नाज़िम हिकमत और महमूद दरवेश हमारे उसी श्रेणी के अपने नायक रहे हैं जैसे भगत सिंह, सुकांत भट्टाचार्य, पाश, गोरख पांडेय और धूमिल। हमारे देखते-देखते पूरी दुनिया का भौगोलिक नक़्शा बदलता गया और ये नायक इतिहास के एपिक में अपनी-अपनी धमाकेदार पारी खेल कर शारीरिक रूप से विदा तो हो गए, परंतु किताबों में संकलित उनके लेख, भाषण, कहानी, कविता और विचार मनुष्य जाति की सांस्कृतिक विरासत की कालजयी श्रृंखला की कड़ी बन कर आगामी पीढ़ियों के लिए उपलब्ध रहे। वे उन्हें विकट परिस्थितियों में हौसला देते रहे और अन्याय-अत्याचार को न बर्दाश्त करने के लिए प्रेरित भी करते रहे। वह ऐसी प्रेरक विरासत है जिसने दरअसल दुनिया को भिन्न-भिन्न श्रेणियों की सरहदों में बाँटने की कुटिल साज़िशों को बेअसर किया है - क्षेत्रीय, भाषाई और राष्ट्रीय दीवारें ढहाई हैं और प्रतिकार के नए-नए वैकल्पिक रास्तों को सुझाते हुए एक-दूसरे से सीखने के औज़ार उपलब्ध कराए हैं।
सबसे पहले फ़िलिस्तीन की बात - लंबे समय से दुनिया भर में चौधरी की भूमिका निभाता अमेरिका और उसकी चाभी से संचालित उसके मुंशी इजराइल की आधिकारिक किताबों और शब्दावली में फ़िलिस्तीन नाम का कोई देश नहीं है। पर सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि 2025 में फ़िलिस्तीन को 157 देशों की (संयुक्त राष्ट्र के 81%) मान्यता प्राप्त थी और हाल-फ़िलहाल तक यह गिनती बढ़ती जा रही है। 1948 से आज तक कभी युद्ध तो कभी अनेक अघोषित अभियानों के ज़रिए यह गिरोह फ़िलिस्तीनी भूमि को हड़पता रहा है, उसकी आबादी को आतंकित, विस्थापित और नष्ट करता रहा है, फ़िलिस्तीनियों की भाषा-संस्कृति, जीवन शैली और विशिष्ट ऐतिहासिक पहचान को हमेशा के लिए मिटा डालने की पुरज़ोर कोशिश करता रहा है। इन हमलों में कितने फ़िलिस्तीनियों की हत्या हुई इसका कोई प्रामाणिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को ग़ज़ा पर इजराइल ने जो हमले शुरू किए, वे अब तक जारी हैं। 16 मई 2026 को द गार्डियन में प्रकाशित एक लेख में संयुक्त राष्ट्र के हवाले से बताया गया है कि सिर्फ़ ग़ज़ा में तब से अब तक बमबारी में 72619 फ़िलिस्तीनियों की जान जा चुकी है - हर दिन 75 से ज़्यादा असामयिक मौतें। विडंबना यह है कि आज फ़िलिस्तीन की मूल भूमि पर जितने फ़िलिस्तीनी रह रहे हैं, संख्या में उससे ज़्यादा विदेशों में शरणार्थी बन कर रह रहे हैं।
वे अपनी मेधा और विद्वत्ता के दम पर एकेडेमिक्स, कला और साहित्य में खूब ऊँचाइयों पर पहुँचे लेकिन आज तक उन्हें, जहाँ वे रहते काम करते हैं, उनकी राष्ट्रीय पहचान नहीं मिली। लेकिन उन्होंने अपनी फ़िलिस्तीनी पहचान का परित्याग नहीं किया। अनेक फ़िलिस्तीनी लेखकों-कवियों ने बार-बार हवाई अड्डों और सरहद पर इसे आधार बना कर रोके जाने के अपमानजनक अनुभव बयान किए हैं.... फ़िलिस्तीन के राष्ट्रकवि के तौर पर याद किए जाने वाले महमूद दरवेश इस बारे में अपने भाव सबसे ज्यादा तड़प और संताप के साथ व्यक्त करते हैं:
जैसा हर बार होता रहा है इस एयरपोर्ट पर भी आपको अवांछित व्यक्ति घोषित कर दिया जाता है -आपके हाथ में जो दस्तावेज़ हैं वे भूगोल के साथ नाम जोड़ कर देखने के तर्क पर खरे नहीं उतरते : जिस देश का अस्तित्व दुनिया से ख़त्म हो गया उस देश का नागरिक होने का दावा करने वाला भला कैसे मौजूद हो सकता है? आप गैर मौजूद देश के रूपक की बात करोगे तो उनका जवाब होगा : तो फिर जो देश गैर मौजूद है वह है ही नहीं।
आज के दौर में पूरी दुनिया में ग़ौर से सुने जाने वाले युवाल नोवा हरारी कहते हैं:
कहानी गढ़ना और कहना हमारा सुपर पावर है। पूरे ब्रह्मांड में मनुष्य ही ऐसी नायाब प्रजाति है जिसे ख़ुद को व्यक्त करने के लिए भाषा का प्रयोग करना आता है - वह चाहे किसी चीज़ को देखने, चखने और छूने से प्राप्त अनुभव हो या फिर जो सचमुच में उपस्थित नहीं है उन चीज़ों की कल्पना और आविष्कार करने की कला।
इतना ही नहीं हरारी तो ज़ोर देकर यह कहते हैं कि सेपियंस (मनुष्य के पूर्वज) पूरी दुनिया पर राज इसलिए कर सके क्योंकि उनमें कहानी कहने का हुनर था। उन्होंने ऐसी कहानियाँ कहीं जिससे व्यापक स्तर पर लोग एक दूसरे से जुड़े और साथ-साथ काम करने को प्रेरित हुए।
समाज के जीवन में कहानियों की क्या भूमिका होती है, इसके बारे में बात करते हुए प्रख्यात जर्मन सांस्कृतिक आलोचक वाल्टर बेंजामिन को स्मरण करना ज़रूरी है जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के बाद के अनुभवों पर आधारित अपने बेहद चर्चित लेख स्टोरीटेलर (1936) में कहानियों के बारे में कहा है कि वे सिर्फ़ सूचनाएँ नहीं होतीं बल्कि उनका आधार, पृष्ठभूमि और स्वरूप सामूहिक अनुभवों और ज्ञान के साझेपन और आदान-प्रदान का होना चाहिए। वे आगे कहानियों के अपने समय और स्थान में गहरे धँसे होने और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते जाने के बारे में भी बात करते हैं।
उनका यह बहुचर्चित लेख आगे कहता है कि कैसी विडंबना है कि मनुष्य सुनने-पढ़ने और अपने अनुभवों को एक-दूसरे के साथ साझा करने की नैसर्गिक इच्छा तो रखता है, लेकिन तकनीकी प्रगति और सत्ता तंत्र का ऐसा स्वरूप विकसित होता जा रहा है जिसमें वह अपनी आवाज़, अपने हाथ और यहाँ तक कि अपना जीवन भी गँवाता जा रहा है। दुनिया भर में हर ओर ऐसी घटनाएँ घटती दिखाई दे रही हैं कि अपना जीवन पूरा जी पाने से बड़ी संख्या में लोग वंचित किए जा रहे हैं। ऐसे में एक-दूसरे से अनुभव साझा करने के वास्ते लिखने और लिखे जाने की संभावना दिनों दिन क्षीण होती जा रही है।
7 अक्टूबर 2023 को ग़ज़ा में शुरू हुई इजराइली बमबारी में मारे गए कवि-चिंतक रफ़ात अल अरीर ने हाल के बरसों में युवा फ़िलिस्तीनियों को किसी दिन मार दिए जाने से पहले अपने अनुभव किसी न किसी विधा में दर्ज करने के लिए प्रेरित किया कविता, कहानी, संस्मरण, डायरी, फोटोग्राफ, वीडियो, सोशल मीडिया सब में। अपने जीवन की अनिश्चितता को जानते हुए उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा भीः
यदि मुझे मरना पड़ता है
तो तुम्हें पक्के तौर पर जीना पड़ेगा
ताकि लोगों को बता सको मेरी कहानी
***
यदि मुझे मरना पड़ता है
तो इस से उम्मीद फूटनी चाहिए
इसे कहानी की तरह लोगों को सुनाना।
दुनिया भर में बसे फ़िलिस्तीनियों ने अपने-अपने तरीक़ों से 1948 के विस्थापन की त्रासदी को याद करते हुए उस पश्चिमी विमर्श को अहिंसक ढंग से चुनौती दी है, जिसने उन्हें अनपढ़, गँवार, जाहिल, संस्कृतिविहीन और इतिहासविहीन ठहराने का प्रयास किया। तभी तो इतने बमवर्षक और बुलडोजर लगा कर भी फ़िलिस्तीनी गाँवों के जैतून के बाग़ों की तरह उनकी स्मृतियों को नष्ट नहीं किया जा सका। जितना ही उनका खून बहता है उतना ही वे रक्तबीज की तरह नए-नए रूप में उग आते हैं। नृतत्वशास्त्री मानते हैं कि तीन-चार पीढ़ियाँ बीत जाने के बाद भी उनके सपनों को नष्ट नहीं किया जा सका तो इसलिए कि फ़िलिस्तीनियों ने अपने संताप को क़िस्से-कहानियों की वर्चुअल प्रवहमान नदी का रूप दे दिया है। बाहरी आक्रमण कितने भी विध्वंसकारी हों अगली पीढ़ी को हस्तांतर होती हुई स्मृतियों में उनकी विरासत अक्षुण्ण बनी रही। उन्हें हर पल यह याद रहता है कि उन्हें उनके घरों से बलपूर्वक खदेड़ कर निकाला गया था, वे अपने छूटे हुए घरों और भूमि के असल मालिक हैं (अपने गले में उन घरों की चाभियाँ लटकाए रहना फ़िलिस्तीनियों के प्रतिरोध का प्रतीक है) और एक दिन वे लौट कर अपनी धरती पर ज़रूर जाएँगे।
इस सिलसिले में प्रतिष्ठित फ़िलिस्तीनी आर्किटेक्ट और संरक्षण विशेषज्ञ खल्दून बशरा को उद्धृत करना प्रासंगिक होगाः
फ़िलिस्तीनी शरणार्थी अपने भीतर के गहरे ज़ख़्म याद रखने के लिए उन चाभियों को अपने गले में लटकाए रहते हैं जिनका प्रयोजन और इस्तेमाल बेमानी हो चुका है, उनसे व्यावहारिक तौर पर किसी तरह का कोई कार्य संपन्न नहीं किया जा सकता -अब ये चाभियाँ कहीं किसी घर का दरवाज़ा नहीं खोल सकतीं। सब कुछ जानते हुए ज़ाहिर तौर पर इस तरह की अनावश्यक शिल्पकृति को सीने से लगाए हुए रहने के मायने कुछ और हैं।
तभी तो महमूद दरवेश अपनी एक बेहद चर्चित कविता में कहते हैं:
हमलावरों को स्मृतियाँ भयभीत करती हैं
दरिदों को गीत डराते हैं
उसका नाम पहले भी फ़िलिस्तीन था
अब भी वह फ़िलिस्तीन है।
फ़िलिस्तीनी कविता से हमारा परिचय तो लंबे समय से रहा है लेकिन फ़िलिस्तीनी कहानियों के साथ दुर्भाग्य से वैसा रिश्ता हिंदी पाठकों का नहीं बन पाया क्योंकि हिंदी में वे उपलब्ध नहीं रहीं। हाल-फ़िलहाल में गस्सान कनफ़ानी की कहानियों के अनुवाद उपलब्ध हुए हैं लेकिन उनको हमारे बीच से गए हुए भी पचास साल से ज़्यादा हो गए। इस दरमियान फ़िलिस्तीन का भूगोल, समाज, संस्कृति, सब कुछ बहुत बदल गया - यह बदलाव स्वाभाविक नहीं था बल्कि सब कुछ बलपूर्वक बदल दिया गया... और साम, दाम, दंड, भेद हर तरह से कोशिश की गई कि फ़िलिस्तीन के नाम से जुड़ा हुआ ऐसा कुछ भी धरती पर न बचे जो उसके इतिहास, विरासत, संस्कृति इत्यादि का सबूत दे सके।
इन हालात में हमें यह ज़रूरी लगा कि अमानवीय अत्याचारों और पैशाचिक जनसंहार के बीच फ़िलिस्तीनियों के साथ भावनात्मक एकजुटता दिखाने का (भारत सरकार तो उनके विरुद्ध युद्ध अपराधों में खुले तौर पर शामिल है) एक रास्ता यह है कि इन विकट परिस्थितियों में उनके बीच बची हुई उम्मीद की लौ को सहारा दिया जाए.... चारों ओर से मौत से घिरे हुए बेहद सुसंस्कृत समाज की रचनाशीलता में कहानी का संधान किया जाए। समकालीनता के आग्रह के साथ तैयार इस संकलन की मार्फ़त हम फ़िलिस्तीनी समाज को थोड़ा आश्वस्त कर पाएँगे कि वे भुला दिए गए लोग नहीं हैं... हमें याद है कि यासिर अराफ़ात और इंदिरा गांधी के बीच भाई-बहन का प्यार और सम्मान था।
ख़ुद इतिहास के अँधेरे दौर को झेल चुके प्रसिद्ध जर्मन नाटककार कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त ने सवाल जवाब शैली में बिल्कुल सही कहा है:
क्या अँधेरे में भी गीत गाए जाएँगे?
हाँ, अँधेरे में
अँधेरे के बारे में गीत गाए जाएँगे।
हमें विश्वास है कि जब अँधेरे की बात की जाएगी तो उजाले की कामना इसमें स्वतः शामिल हो जाएगी।
फ़िलिस्तीन की कहानियों के संकलन येरुशलम का पत्थर (वाम प्रकाशन, नई दिल्ली) से साभार

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