Sunday, October 18, 2026

रचना लोक पर दो रचनाएं - राजेश सकलानी

 

 

 

 


(  अपनी और दूसरी भाषा के कवियों पर कविताएं प्रायः मिल जाती हैं , किसी कथाकार पर कविता मिलना मुश्किल होता है। राजेश सकलानी पहली कविता में मोहन थपलियाल पर लिखते हुए इस जमीन को तोड़ते हैं। दूसरी कविता में वे नाजिम हिकमत की कविता का अनुवाद करते हुए वीरेन डंगवाल को याद कर रहे हैं- इस तरह एक ही कविता में दो अलग भाषाओं के कवियों को भी याद कर रहे हैं)


 

 मोहन थपलियाल की फोटो

 

 आपकी एक  फोटो देखी मैने 
जो मेल खाती है आपके पुराने दोस्तों की बनाई तस्वीर से  ,
 जिसे बनाते वक़्त उनकी अपनी त्वचा
 नम  हो जाती  ,
  वत्सलता की वलयाकार तरंगें झूमने लगतीं ,
            आपकी आंखों की विनम्रता  से आकर्षित हो कर 
 धूप का रंग आत्मीय हो जाता ,
 तकलीफें धूमिल पड़ जातीं,
गोया कि हम आपके गांव से आए हैं, कुछ पुरानी यादें ताजा हो आईं हैं। 

 आपकी त्वचा का स्वभाव कांसे की तरह हैं,
उनमे समाज का टैक्सचर , सघन भावात्मकता,  भीतर की कसमसाहटें, उच्छ्वास, 
द्वन्द्वात्मक परिस्थितियां 
 ठहराव के साथ  व्यक्त होतीं हैं

          आपकी कहानियों के साथ गुज़रो तो आप छिप कर साथ बने  रहते हो ,
आंखों में उम्मीद के लिए छटपटाते  हो ,

 चेहरे पर संकोच की मांसपेशियां  हिलतीं  
तब एक फूल खिलता 
ठोस, 

खड़ी चढ़ाई से
नज़रें जातीं हैं
गहराई तक ।



 

 

जब अनुवाद भया वीरेन 

 

 वह कौन सी ऋतु 
कौन सा पहर है,
इसका मैं पुनर्वास करता हूं ,
कुर्सी मेज का दृश्य तो कदापि नहीं होगा 
अपने बिस्तर पर तुमने कई बार अलटा-पलकी की होंगी ,
न बैठने में न लेटने में सुकून  है,
बिछी चादर कर डाली होगी बेतरतीब, 
हृदय में उठी होंगीं मीठी लहरें 

 
जैसे रस्सी बटी जाती हो ऐसी ऐंठन 
लगती होगी
जब भया अनुवाद नाज़िम हिक़मत की 
कविताओं का,


मैं उन घड़ियों में बिना इजाज़त  प्रवेश करते हुए गुम हो जाता हूं ,
 9. 10 रात्रि की कविताओं से पता चलता है कि भाई तुम भी रात में जागने लगे हो, 
शोषण की खबरों ने पलकों के नरम प्रदेश को उजाड़ दिया है,
और आकाश के  किसी अज्ञात मार्ग से
तुम दुनिया के मेहनतकशों की 
खैरियत जानने निकल पड़े  हो,
" गोया एक दूसरा शख्स है मेरे भीतर "
यह  समझा तुमने ठीक इसी वक़्त 
"जीना एक संगीन मामला है " 
ऐसा कुछ तुमने दोहराया . 

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